वेदों में छुपा है व्रह्मांड का रहस्य

 वेदों में छुपा है व्रह्मांड का रहस्य

इसमे कोई संदेह नही हमारे वेद, वेदांत,दर्शन,संहिता और पुराण में हमारे सृष्टि की रचना तथा रक्षा की उपाय भर कर समझाया गया है।
इनमे से ऋग्वेद को सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ होने का सम्मान मिल चुका है।
दुख की बात ये है संस्कृत में अज्ञानता के कारण या फिर कंवेट स्कुल के शिक्षा से हम उस प्राचीन ज्ञान से दूर हो चुके है। दुसरी तरफ जर्मनी इंग्लैंड में संस्कृत को आवश्यक भाषा के रुप में पढाया जाता है और हमारे यहा भारत में ''बेक डेटेड'' कह कर एंग्रेजी के पीछे दौर रहे है।
हममे वहुतो को ये भी नही पता सर्वप्रथम शिक्षा व्यवस्था एवं 13 प्राचीन विश्वविद्यालय यहा भारत में था जिसे मुस्लिम आक्रमणकारी लोगो ने नष्ट कर दिए। जिसमे बहुतो प्राचीन ग्रन्थ जल गये। इहा देश विदेश से हमारे ज्ञान विज्ञान पर अध्ययन करने वहुतो छात्र आते थे।
आज भी हमारे प्राचीन धातुकर्म और वास्तुकला वैज्ञानिको के लिए आश्चर्य वना हुआ है।
पिथागोरस से ले कर आईनस्टाईन तक भारत में आकर भारतीय ग्रंथ के अध्ययन करके नये खोज कीए है।

सामवेद में ऒजोन परत का विवरण

हमारी धरती का वातावरण ,धरती के चारों और एक गिलाफ (आवरण) की तरह चढ़ा हुआ है जो सबसे नीचे धरती की सतह से ,१० कि.मी तक टोपोस्फीअर, १० से ५० किमी तक स्ट्रेटोस्फीअर व ऊपर आयेनो स्फीअर कहलाता है| स्ट्रेटो स्फीअर में ओजोन गैस की सतह होती है जो धरती का एक तरह से सुरक्षा कवच है और सूर्य की घातक अल्ट्रा -वायलेट किरणों से हमारी रक्षा करता है । इसी को धरती की ओजोन छतरी कहा जाता है।
ओजोन गैस(O ३) , प्राण-वायु आक्सीजन का (O २ ) का एक अपर-रूप है जो सारी प्रथ्वी का लगभग ९३% ओजोन सतह में पाई जाती है एवं स्वयं शरीर के लिए आक्सीजन की तरह लाभकारी नहीं है। यह गैस स्ट्रेटो स्फीअर में उपस्थित ऑक्सीजन के सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों की क्रिया से बनती है ---O2 -+-अ -वा किरणें = 0+0 ;0 + 02 =03- -, यह एक अस्थिर गैस है, इस प्रकार , ओजोन-आक्सीजन चक्र बना रहता है।
अल्ट्रा वायलेट किरणें शरीर के लिए घातक होतीं है , ये सन-बर्न , मोतिया-बिन्दु, त्वचा के रोग व केंसर तथा आनुवंसिक हानियाँ पहुचातीं हैं। नाइट्रस आक्साइड ,क्लोराइड-ब्रोमाइड आदि ओर्गानो-हेलोजन ,जो मुख्यतः री फ्रिरेटर ,ऐ सी ,यूरोसोल पदार्थ ,कोल्ड-स्तोराज से निस्रत सी ऍफ़ सी ( क्लोरो-फ्लोरो कार्बन) के रेडिकल हैं ;ओजोन गैस को केटालाइज करके ओजोन सतह को नष्ट करते हैं और इस सुरक्षा छतरी में छिद्र का कारण बनते हैं। अति-भौतिकता की आधुनिक जीवन शैली के कारण आज उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के ऊपर बड़े -बड़े छिद्र बन चुके हैं जो मानव जीवन व प्राणी, वनस्पति जीवन के लिए भी घातक हैं। हमें समय रहते अपने पर्यावरण को बछाने हेतु चेतना होगा। इस रक्षक आवरण के बारे में सदियों पूर्व gवैदिक -विज्ञान द्वारा चेतावनी दी जा चुकी है। इस ओजोन-छतरी का वर्णन साम-वेद की इस ऋचा में देखिये--
"इमं भ्रूर्णायु वरुणस्य नाभिं ,त्वचं पशूनां द्विपदा चतुश्पदायाँ । त्वस्तुं
-प्रजानां प्रथमं जानित्रमाने मां हिंसी परमे व्योमन॥"---साम वेद १३/५०।
अर्थात --यह प्रथ्वी के चारों और रक्षक आवरण जो स्रष्टि में सर्वप्रथम उत्पन्न वरुणस्य नाभि रूप (जलस्थल एवं आकाश के मध्य स्थित ) रहकर, छन्ने की तरह अन्तरिक्ष कणों को प्रविष्ट न होने देकर प्राणियों( द्विपद एवं चतुस्पद) की रक्षा करता है;
उसे ऊर्जा के अनियमित व अति उपयोग से नष्ट न करें (मां हिंसी) उस आकाश (परमे व्योमन) का।

आयन मंडल का विवरण ऋग्वेद में

आयन मंडल (आयेनो स्फीअर )
अतिरिक्त जानकारी ऋग्वेद प्रत्यक्ष रूप से ये कहता है की.
"ये अंसन्ना य ऋधग्रोदसी ये विभ्वो नर: स्वपत्यानी चक्रु:।। (ऋग्वेद 4:34:9 )"
अर्थ = जिन ऋभुजो (पराबैंगनी किरणों) ने अपने रक्षण साधनों से द्यावा (आकाश) और पृथ्वी के बीच कवच विनिर्मित करके इन दोनों को पृथक किया तथा जिन बलशाली नायको ने उत्तम कर्मो को संपन्न किया, वे सर्वप्रथम सोम पान करने वाले हैं. [अश्विनीकुमार आरोग्यवर्धक सूक्ष्म प्रवाह है. ऋभुज किरणों से उनकी क्षमता बढाती है. उन्होंने ही प्रकृति-भूखंडो को उपजाऊ बनाया है. पृथ्वी तथा आकाश के बीच सुरक्षा कवच के रूप में आयन मंडल इन्ही पराबैंगनी किरणों के प्रभाव से ही बनता है. इसी कवच ने ही पृथ्वी और आकाश के बीच विभाजन सीमा बनाई है.l

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